राजनीति में दागियों पर अंकुश लगाना जरूरी, लेकिन आज तक एक भी दल ने इस दिशा में गंभीरता से प्रयास नहीं किया




सुप्रीम कोर्ट ने दोषी करार दिए नेताओं के पार्टी प्रमुख बनने को लेकर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा, यह चिंता का विषय है कि दोषी करार दिया गया व्यक्ति खुद चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य है। ऐसा शख्स किसी राजनीतिक दल का प्रमुख है और वह चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन कर रहा है। बहुत संभव है कि चुने हुए उम्मीदवारों में से कुछ जीतकर सरकार में भी शामिल हो जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार से पूछा कि अगर कोई व्यक्ति जनप्रतिनिधि कानून के तहत चुनाव नहीं लड़ सकता तो वह कोई भी राजनीतिक पार्टी कैसे बना सकता है? कोर्ट की यह टिप्पणी उस फैसले के बाद आई है, जिसमें बीते दिनों केंद्र सरकार को सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों की जल्द सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन का निर्देश दिया था। दागी नेताओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सटीक है। अब सरकार और चुनाव आयोग को इस दिशा में सोचना होगा एवं राजनीति से अपराधीकरण को खत्म करना होगा।
बता दें कि ओम प्रकाश चौटाला और लालू यादव जैसे नेता दोषी करार दिए गए हैं, लेकिन फिर भी पार्टी के सर्वेसर्वा बने हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने इस मसले पर गेंद केंद्र सरकार के पाले में डालने का प्रयास किया है। चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, 1998 से आयोग इस बात की वकालत कर रहा है, लेकिन आयोग के पास दोषी नेता द्वारा राजनीतिक पार्टी चलाने पर पाबंदी का सर्वाधिकार नहीं है। अगर संसद से कानून में बदलाव कर ऐसा प्रावधान किया जाता है तो हम इसे लागू कराने की कोशिश करेंगे। देश के राजनीतिक तंत्र को दागियों से मुक्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से कुछ अन्य दिशा-निर्देश भी आने चाहिए। यह ध्यान रहे कि पुलिस हत्या जैसे संगीन जुर्म के मामले में भी जितने लोगों के खिलाफ अदालतों में आरोप पत्र दाखिल करती है, उनमें से केवल 10 प्रतिशत आरोपितों को सजा हो पाती है। अधिकतर मामलों में गवाह अदालत में जाकर पलट जाते हैं, क्योंकि वे अपार राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत से लैस आरोपियों के सामने टिक नहीं पाते हैं।
अमेरिका और फिलीपींस सहित दुनिया के कई देशों में गवाहों की सुरक्षा के लिए कई कानूनी और अन्य उपाय किए गए हैं। अमेरिका में 85 सौ गवाहों और उनके 99 सौ परिजनों को 1971 से ही मार्शल सर्विस सुरक्षा दी जा रही है। खुद अपने यहां सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह गवाहों की सुरक्षा के उपाय करे। 1958 में विधि आयोग ने भी गवाहों की सुरक्षा के उपाय करने के लिए केंद्र सरकार को सुझाव दिए थे, पर कुछ नहीं हुआ। इस तरह की अनेक खामियों के कारण आपराधिक मामलों में पूरे देश में सजा का औसत प्रतिशत 45 है। 1953 में यह प्रतिशत 64 था। सीबीआई थोड़ा बेहतर नतीजे जरूर देती है, फिर भी विकसित देशों के मुकाबले यहां की स्थिति दयनीय ही कही जाएगी। अमेरिका में सजा का प्रतिशत 93 है, तो जापान में 99 प्रतिशत। अपने देश में सत्तर के दशक से ही सजा के प्रतिशत में गिरावट शुरू हो गई थी।
यह संयोग नहीं है कि राजनीति के अपराधीकरण का भी वही शुरुआती दौर था। जिन राज्यों में राजनीति का अपराधीकरण अधिक हुआ है, उनमें भी सजा का प्रतिशत अन्य राज्यों की अपेक्षा कम है। न सिर्फ गवाह ताकतवर आरोपी के प्रभाव में आ जाते हैं, बल्कि कई जांच अधिकारी भी रिश्वत के प्रभाव से बच नहीं पाते। वैसे भी पुलिस में भ्रष्टाचार का क्या हाल है, यह किसी से छिपा नहीं है। इसलिए गवाहों की सुरक्षा के साथ-साथ मामले की जांच के काम में लगे अधिकारियों पर भी नजर रखने का विशेष प्रबंध करना पड़ेगा। बेहतर तो यह होगा कि धनवान लोगों के मुकदमे देखने वाले अधिकारियों पर भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते नजर रखें। समयसीमा के भीतर सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमों की सुनवाई के मामले में कोई भी ढील आरोपियों को मदद पहुंचाने के समान ही होती है। सजा के बाद पूरे जीवन में फिर कभी चुनाव नहीं लड़ने के प्रावधान का भी सवाल है। अभी कुछ दिनों पहले ही सजा पाए नेताओं पर आजीवन चुनाव न लड़ने के बैन की मांग भी उठी थी, मगर यह तभी हो पाएगा, जब राजनीतिक दलों में आम सहमति बनेगी। समस्या है कि ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों में सहमति क्यों बनेगी? यह वेतन-भत्ते बढ़ाने का मामला तो है नहीं!
सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति से दागियों को बाहर करने के लिए सख्ती करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह दागियों के खिलाफ चल रहे मुकदमों के जल्द निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करे। उसने केंद्र सरकार से कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट को बताए कि देशभर में इस तरह के कितने फास्ट ट्रैक कोर्ट कब तक बनाए जाएंगे और उन पर कितने पैसे खर्च होंगे? कोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा है कि वर्ष 2014 के आम चुनाव के दौरान विभिन्न नेताओं ने हलफनामे में जिन केसों का जिक्र किया था, उनका क्या हुआ? वे मुकदमे अपने अंजाम तक पहुंचे या नहीं और क्या इस बीच उन नेताओं पर कुछ और केस भी दर्ज हुए हैं।
राजनीति में दागीकरण हमारी व्यवस्था के लिए एक बड़ा मुद्दा है। राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए कई कदम पहले भी उठाए गए हैं, लेकिन वे कारगर नहीं हो रहे। हमारा राजनीतिक तंत्र आज भी दागी नेताओं से भरा हुआ है, जो पूरी राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित-संचालित कर रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण है नेताओं के खिलाफ मामलों के निपटारे में सुस्ती। उन पर मुकदमे बीस-बीस साल तक लंबित रहते हैं और कोई नतीजा आने से पहले ही वे अपनी पूरी सियासी पारी खेल जाते हैं। इस तरह हमारा पूरा तंत्र ही एक दागी तंत्र बनकर रह गया है। देश में भ्रष्टाचार की एक बड़ी वजह यह भी है। इस बीमारी से मुक्ति का एक रास्ता यह हो सकता है कि किसी भी राजनेता के खिलाफ चल रहा मुकदमा जल्द से जल्द अपने मुकाम पर पहुंचे और दोषी पाए जाने पर उसे जीवन भर चुनाव न लड़ने दिया जाए।
जाहिर है, देश की न्यायपालिका ने सरकार को सुधार का एक अच्छा रास्ता सुझाया है। लेकिन यह जितना सरल लगता है, उतना है नहीं क्योंकि जिस देश के अधिकतर राजनीतिक दल और नेतागण अपने बारे में सामान्य सूचनाएं भी सार्वजनिक करने को तैयार नहीं, वे अपराधियों को चुनाव लड़ने से हमेशा के लिए रोकने के लिए खुद कोई कानून बनाने को तैयार हो जाएंगे, ऐसा फिलहाल लगता नहीं है। फिर भी राजनीति से दागियों को मुक्त कराने का एक संकल्प तो लेना ही होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे में यह मुद्दा सबसे ऊपर है। लिहाजा, उनसे एक उम्मीद पूरे देश को बंधी है। भ्रष्टाचार मिटाने की दिशा में आगे बढ़ रही सरकार को दागी नेताओं से मुक्ति पाने की दिशा में प्रयास तेज करने चाहिए। इस काम में सरकार को बड़े स्तर पर विरोध का सामना करना पड़ेगा, मगर जनता नोटबंदी की तरह ही साथ खड़ी दिखेगी। उम्मीद है कि सरकार जल्द देश के सामने आदर्श पेश करेगी।

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