संयुक्त राष्ट्र संघ ने खुशहाल देशों की नई सूची जारी कर बताया कि भारत से दूर हो रही खुशहाली


संयुक्त राष्ट्र संघ ने खुशहाल देशों की नई सूची जारी ही की है। 156 देशों की इस सूची में भारत की स्थिति पिछले वर्ष की तुलना में और ज्यादा खराब हुई है। पिछले साल इस सूची में भारत जहां 122वें नंबर पर था, तो इस साल 133वें स्थान पर है। हमें इस स्थिति में बदलाव लाने की दिशा में पहल करनी चाहिए। सिर्फ सरकारी ही नहीं, सामाजिक स्तर पर भी खुशियां बांटने के प्रयास तेज करने होंगे। अगले साल जारी होने वाली इस सूची में भारत को आगे करना ही होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ ने खुशहाल देशों की नई सूची जारी की है। 156 देशों की इस सूची में भारत की स्थिति पिछले वर्ष की तुलना में और ज्यादा खराब हुई है। पिछले साल इस सूची में भारत जहां 122वें नंबर पर था, तो इस साल 133वें स्थान पर है।

इस रिपोर्ट का सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि भारत की अपेक्षा पाकिस्तान को ज्यादा खुशहाल (Happy) बताया गया है। आतंकवाद से त्रस्त पाकिस्तान सूची में 75वें स्थान पर है। इतना ही नहीं चीन, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश और हिंसाग्रस्त म्यांमार में भी खुशहाली भारत से ज्यादा है। रिपोर्ट में फिनलैंड को सबसे ज्यादा खुश देश बताया गया है, तो दूसरी तरफ कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे बुरुंडी के नागरिकों में सबसे ज्यादा असंतोष है। अध्ययन में यह भी पाया गया है कि सबसे ज्यादा खुश प्रवासी भी फिनलैंड में ही हैं। संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट को देखें, तो हमारी स्थिति में लगातार गिरावट आ रही है। ऐसा लगता है कि मानो भारत की खुशी को किसी की नजर लग गई हो। वरना गरीबी से जूझ रहे नेपाल, हिंसाग्रस्त म्यांमार और आतंकवाद से कराह रहा पाकिस्तान हमसे बेहतर कैसे होता?

रिपोर्ट में अफगानिस्तान को 145वां नंबर दिया गया है। मतलब वह हमसे पीछे है, लेकिन पिछले साल से तुलना करें, तो उसकी स्थिति में सुधार आया है। सूची में पिछले साल अफगानिस्तान 147वें स्थान पर था। वहीं भारत 122वें स्थान से 133वें स्थान पर चला गया है। संयुक्त राष्ट्र ने खुशहाल (Happy) देशों की रैंकिंग करते समय जिन पैमानों को ध्यान में रखा है, उनमें प्रति व्यक्ति आय, सकल घरेलू उत्पाद, स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा, उदारता, आशावादिता, सामाजिक समर्थन, सरकार और व्यापार में भ्रष्टाचार की स्थिति शामिल है। विभिन्न देशों की खुशहाली से संबंधित इस रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि देश की जिस तेजी से विकास दर बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से लोगों की खुशियां नहीं बढ़ रहीं।

गुरुवार को ही विश्व बैंक ने अगले वित्त वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था दर 7.3 प्रतिशत और वर्ष 2019-20 में 7.5 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, लेकिन बढ़ती विकास दर के दूसरी तरफ देश के लोगों की सामाजिक सुरक्षा, शासकीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा की स्थिति चिंताजनक है। देश के 80 फीसदी से अधिक लोगों को सामाजिक सुरक्षा की छतरी उपलब्ध नहीं है। आम आदमी के धन का एक बड़ा भाग जरूरी सार्वजनिक सेवाओं, स्वास्थ्य सुविधा और शिक्षा में व्यय हो रहा है। इस कारण बेहतर जीवन स्तर की अन्य जरूरतों की पूर्ति में वे बहुत पीछे हैं। चूंकि, तेज आर्थिक विकास ने करोड़ों भारतीयों में बेहतर जिंदगी की महत्वाकांक्षा जगा दी है, ऐसे में जब देश के करोड़ों लोगों को उपयुक्त सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाएं गुणवत्तापूर्ण रूप से नहीं मिल पा रही हैं।

तो उनकी निराशाएं बढ़ती जा रही हैं। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने एशिया प्रशांत क्षेत्र में भ्रष्टाचार और घूसखोरी का जो ताजा अध्ययन प्रकाशित किया है, उसमें भारत को सर्वाधिक घूसखोरी वाला देश बताया गया है। ऐसे में हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि देश में विकास का मौजूदा रोडमैप आम लोगों को खुशियां देने में पीछे है। देश में हैप्पीनेस को आगे बढ़ाने के लिए खुशहाली से संबद्ध मनोवैज्ञानिक खोजों के निष्कर्षो को भी ध्यान में रखना होगा। सरकार द्वारा भी खुशी बढ़ाने वाले आधारों को आगे बढ़ाना होगा। देश के अधिकांश लोग अपनी जरूरतों की पूर्ति और पश्चिमी संस्कृति की दौड़ में अपने पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के सुख-संतोष से वंचित हो रहे हैं। परिवारों में तनाव बढ़ रहे हैं। संस्कारों में कमी आ रही है, लोगों में निराशा की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

देश के सभी लोगों तक यह बात पहुंचाई जानी होगी कि सिर्फ धन के ढेर लगाने से ही खुशहाली नहीं आती, धन की कमाई में अपने पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन को भूलने से वास्तविक खुशहाली दूर हो जाती है। परिवार में दबाव से नहीं अपितु प्रेम और संस्कार की बदौलत खुशियों को संजोकर रखा जा सकता है। खुशहाल देशों की पहली पंक्ति में स्थान पाने वाले देशों की तरह हमें भी आम आदमी की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति और सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों से सीख लेनी होगी। देश में नैतिक मूल्यों को प्रतिस्थापित करने के लिए ठोस और रणनीतिक प्रयासों की डगर पर आगे बढ़ना होगा। खुशहाल (Happy) देशों की रिपोर्ट में भारत बहुत निचले पायदान पर है, लेकिन अब जो आर्थिक-सामाजिक परिदृश्य उभरता हुए दिखाई दे रहा है, उसके आधार पर भारत में खुशहाली बढ़ने की संभावनाएं बढ़ गई हैं।

बस इसे गति देने की जरूरत है। यह काफी पहले से ही कहा जाता रहा है कि सिर्फ धन से खुशियां नहीं खरीदी जा सकतीं। हां, खुशियों के पैमाने में धन भी एक महत्वपूर्ण कारक जरूर है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने खुशियों से भरे देशों की सूची जारी की है, जिसमें सबसे धनी कहलाने वाले देश भी पिछड़ गए। इस कतार में अपने देश की स्थिति और भी शर्मनाक है। दुनिया भर में हम खुद को भावी आर्थिक महाशक्ति और जाने क्या कहते फिर रहे हैं। परंतु, इस सूची ने हमें बड़े खतरे की ओर संकेत किया है। यह बताता है कि हम आर्थिक स्थिति में भले ही बेहतर हो रहे हैं, अरबपतियों की संख्या भले ही लगातार बढ़ रही है, लेकिन देश से खुशहाली गायब हो रही है। हालांकि, खुशहाली का दूर होना बहुत चौंकाने वाली खबर नहीं है।

आर्थिक महाशक्ति का दंभ भले ही हम भर लें, लेकिन देश के आंकड़े बताते हैं किसानों की आत्महत्या करने की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। विकास के नाम पर लोगों को विस्थापित अधिक किया जा रहा है, पुनर्वास बहुत कम। सरकार की आर्थिक सुधार नीतियों ने बेरोजगारों की संख्या तेजी से बढ़ाई है। यह रिपोर्ट बताती है कि लाखों युवाओं को नौकरी से निकाल दिया गया। बेघर लोगों की संख्या तो करोड़ों में है। भ्रष्टाचार ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। सुरक्षा व्यवस्था को अपराधी हर जगह चुनौती देते नजर आ रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य पूरी तरह से अमीरी और गरीबी में बंटर चुका है। संयुक्त राष्ट्र ने इन सारी स्थितियों पर गौर किया होगा। हमारी बेहतरी इसमें है कि हम इस सूची को अपने लिए गंभीर चेतावनी और चुनौती मानते हुए काम करें।

उन खामियों को पूरी संजीदगी से दूर करें, जिसके कारण खुशहाली हमसे दूर होती जा रही है। सरकार ने नीतियों को जिस तरह ग्रामीण भारत और गरीबों पर केंद्रित किया है, उसका लाभ भी आम आदमी को मिलेगा। इतना ही नहीं स्वच्छ भारत अभियान के तहत सरकार गरीबों के लिए शौचालय बनवाने व गरीबों को मुफ्त गैस सिलेंडर देने की डगर पर जिस तेजी से बढ़ी है, उसका प्रभावी लाभ भी बड़ी संख्या में लोगों को मिलेगा। ऐसे में आशा कर सकते हैं कि आर्थिक-सामाजिक कल्याण के विभिन्न कदमों से अगले वर्ष संयुक्त राष्ट्र द्वारा तैयार की जाने वाली हैप्पीनेस सूची में भारत कई पायदान ऊपर पहुंचा दिखाई दे सकेगा।
 
राजकिशोर सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)

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