जनप्रतिनिधियों की बढ़ती संपत्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रवैया अख्तियार कर लिया


नेताओं की संपत्ति में हो रहे इजाफे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रवैया अख्तियार कर लिया है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्यों हर बार राजनीति की गंदगी दूर करने के लिए कोर्ट को ही पहल करनी पड़ती है? अब जबकि शीर्ष कोर्ट की तरफ से पहल की गई है, तो सरकार को चाहिए कि वह इसे सख्ती से अमल में लाए, ताकि राजनीति सिर्फ अमीर होने का जरिया न रहे, बल्कि देश की आम जनता को मजबूत करने का रास्ता बने और राजनीति का उद्देश्य सार्थकता न खोने पाए। बीते पांच साल में दूसरी बार चुने गए 25 सांसदों और 257 विधायकों की धन-दौलत में पांच गुनी वृद्धि हुई है। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में यह खुलासा समाजसेवी संगठन लोकप्रहरी ने किया है। इस याचिका के मुताबिक, बांसगांव के भाजपा सांसद कमलेश पासवान की संपत्ति में 5,649 फीसदी का इजाफा हुआ है।
उनकी संपत्ति 17 लाख 68 हजार से बढ़कर 10 करोड़ 16 लाख 40 हजार 625 रुपए हो गई। इसी तरह केरल के मुस्लिम लीग सांसद ईटी मोहम्मद बशीर की संपत्ति में दो हजार गुना बढ़त हुई है। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की संपत्ति में 573 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अब उनकी संपंत्ति एक करोड़ 37 लाख 94 हजार 768 रुपए से बढ़कर 9 करोड 28 लाख 95 हजार 288 रुपए हो गई है। केरल के मावेलीकारा से सांसद कोडिकुन्नील सुरेश की संपत्ति में 702 फीसदी बढ़ी है। भाजपा सांसद वरुण गांधी की संपत्ति में 625 फीसदी और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा की संपत्ति में 588 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। स्वस्थ लोकतंत्र के संवैधानिक एवं नैतिक अस्तित्व के लिए सांसद एवं विधायकों की बेदाग छवि बहुत जरूरी है। चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता भी तभी तक बहाल रह सकती है।
जब तक जनप्रतिनिधियों का नैतिक बल मजबूत हो। सांसदों और विधायकों द्वारा वैध-अवैध चल-अचल संपत्ति की जमाखोरी करना लोकतंत्र के असफल होने का शुरुआती संकेत है। अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई तो यह लोकतंत्र के विनाश की ओर बढ़ेगा और माफिया राज का मार्ग खुलता जाएगा। दुर्भाग्य से हमारे देश में अब तक संसद और निर्वाचन आयोग ने इस समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया है। गोया, इस लिहाज से जनप्रतिनिधियों और उन पर आश्रित परिजनों की संपत्ति की निगरानी के लिए एक तंत्र का होना बहुत जरूरी हो गया है, जिससे यदि उनकी संपत्ति में कोई असंगत या अवैध वृद्धि होती है तो उस पर कार्यवाही की सिफारिश की जा सके। देश की सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव जीतकर दौलत अर्जित करने वाले सांसदों और विधायकों पर अंकुष लगाने की दृष्टि से इन पर निगरानी का ढांचा खड़ा करने की पहल की है।
इस सिलसिले में लोकप्रहरी के अलावा सीबीडीटी ने भी सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि शुरुआती जांच में सात लोकसभा सांसदों और 98 विधायकों की संपत्ति में बेहिसाब वृद्धि दर्ज की गई है। जनप्रतिनिधियों को पत्नी, बच्चों और आश्रितों की आय के स्रोत भी बताने के आदेश जारी किए जाएं। दरअसल याचिका में शामिल एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म ने चुनाव के वक्त उम्मीदवारों द्वारा दाखिल हलफनामों में बताई गई  है। चल-अचल संपत्ति के तुलनात्मक मूल्यांकन के आधार पर सांसद और विधायकों की संपत्ति में बढ़त के दस्तावेजी सबूत अदालत को दिए हैं। मुख्यमंत्री रहीं जयललिता भी आय की इसी वृद्धि की चपेट में आ गई थीं और उन्हें मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर जेल जाने के साथ पद भी गंवाना पड़ा था।  जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला 1996 में न्यायालय ले गए थे।
स्वामी ने इस मामले का आधार उन दो शपथ-पत्रों को बनाया था, जो जयललिता ने 1991 और 1996 में विधानसभा चुनाव का नामांकन दाखिल करने के साथ किए थे। जुलाई 1991 को प्रस्तुत हलफनामे में जयललिता ने अपनी संपत्ति 2.01 करोड़ रुपए घोषित की थी। पांच साल मुख्यमंत्री रहने के बाद जब 1996 के चुनाव के दौरान उन्होंने जो शपथ-पत्र नामांकन पत्र के साथ प्रस्तुत किया, उसमें दौलत 66.65 करोड़ रुपए घोषित की थी। नतीजतन अनुपातहीन संपत्ति की उलझन में उलझ गईं और जेल जाने के साथ पद भी गंवाना पड़ गया था। भारतीय लोकतंत्र और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जो अनिश्चय, असमंजस व हो-हल्ला का कोहरा छाया हुआ है, वह इतना गहरा, अपारदर्शी और अनैतिक है कि इससे पहले कभी देखने में नहीं आया। शेर-गीदड़ और कुत्ते-बिल्ली एक ही घाट पर पानी पीने में लगे हुए हैं।
राष्ट्रीय हित व क्षेत्रीय समस्याओं को हाशिए पर छोड़ जनप्रतिनिधियों ने सत्ता को स्वंय की समृद्धि का साधन और वोट बैंक की राजनीति का खेल जिस तरह बनाया हुआ है, वह लोकतंत्र को लज्जित करने वाली स्थिति है। लिहाजा, लोकतंत्र के एक प्रतिनिधि को पूरी तरह ईमानदार, नैतिक दृष्टि से मजबूत और जनता एवं संविधान के प्रति जबाबदेह होना ही चाहिए। आपने यदि सोने में 15 साल निवेश किया होगा तो फायदा 13.66 प्रतिशत फीसदी हुआ होगा। आपने शेयर बाजार में 15 साल निवेश किया होगा तो फायदा 13.97 प्रतिशत फीसदी हुआ, लेकिन पांच साल सियासी कुर्सी पर निवेश करने पर मुनाफा 1015 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। सुनकर चौंक गए होंगे आप कि क्या राजनीति देश में सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाली जगह है? देश का कोई भी नेता तो आपको ये बात नहीं बताएगा।
केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कुछ दिनों पहले ये सच भी देश को बताया था। केंद्रीय इस्पात मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा था कि बिजनेस में चाहे फेल हो जाओ,सरकारी नौकरी में फेल हो जाओ, अच्छे डॉक्टर न बन सको, अच्छे टीचर न बन सको, अच्छे वकील न बन सको तो राजनीति में प्रवेश कर लो..आजकल तो किसी को और कहीं से नजर न आए..तो सबसे अच्छा धंधा तो राजनीति है। सियासत में दिन दूनी रात चौगुनी होने वाली बरक्कत पर किसी राजनेता का इससे साफ कबूलनामा कभी नहीं हो सकता। राजनीति उन्हें पांच साल में मालामाल कर ही देती है। जिस उत्तर प्रदेश में छह करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जीते हैं। उसी प्रदेश में विधायक करोड़पति चुने जाते हैं। देश की सियासत में नेताओं की संपत्ति बढ़ते जाने की एक बड़ी वजह है नेताओं का असली आय, संपत्ति और मिलने वाले पैसे का सही स्रोत न बताना।
पांच साल में अकूत दौलत कोई बनाएं तो उसका स्रोत भी पूछा जाए। सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश में इसी अवधारणा की पुष्टि हुई है, जिसमें कहा गया है कि अब चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी को खुद के साथ पत्नी और रिश्तेदारों की संपत्ति भी बतानी होगी। सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश का सीधा सा मतलब यही है कि राजनीति को कारोबार बनाने वाले नेता जाग जाएं। वैसे, हम पहले भी इस दिशा में प्रयास कर सकते थे, मगर नहीं कर पाए। अब जबकि शीर्ष कोर्ट की तरफ से पहल की गई है, तो सरकार को चाहिए कि वह इसे सख्ती से अमल में लाए, ताकि राजनीति सिर्फ अमीर होने का जरिया न रहे, बल्कि देश की आम जनता को मजबूत करने का रास्ता बने। पैसा कमाने की चाह लेकर राजनीति में आने वाले लोगों की मंशा ही सेवा और देश के प्रति जिम्मेदारी का बोध खत्म कर रही है।

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