यह अभिभावकों की परीक्षा का समय है


राजएक्सप्रेस, भोपाल। परीक्षा के समय बच्चों पर बनाया जाने वाला बेवजह का दबाव रिजल्ट के समय अवसाद का कारण बन जाता है। इसी अवसाद में कई बच्चों को जान देते तक देखा गया है। अब यह अभिभावकों (Parental Pressure)को तय करना है कि वे अपने बच्चों को जिंदगी की परीक्षा पास करते देखना चाहते हैं या फिर स्कूल की। अत: बच्चों को उनके अनुसार सफलता के पायदान चढ़ने दिया जाए।
परीक्षा परिणामों के समय घरों में बच्चों को केवल उम्मीद भरी नजर से देखा जाता है। सफलता या असफलता की स्वीकार्यता को लेकर उन्हें मानसिक रूप से तैयार नहीं किया जाता। न ही घर के बड़े सदस्य इसके लिए तैयार होते हैं। बच्चों को यह दिलासा भी नहीं दिया जाता कि अंक चाहे जैसे आएं हम तुम्हारे साथ हैं। हालिया सालों से परीक्षाओं के नतीजे आते ही बच्चों के घर छोड़ने और आत्महत्या करने जैसी खबरें सुर्खियां बनने लगती हैं। ऐसे में जरूरी है कि परिणाम आने के समय पर भी  बच्चों को संबल दिया जाए। बच्चों को समझाएं कि अगर वे परीक्षा में असफल भी होते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि वे जीवन में असफल हो गए हैं। राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार, परीक्षा में असफल होने के डर और फेल हो जाने से 18 वर्ष से कम आयु तक के 1284 छात्रों ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली थी। 2015 के आंकड़ों के अनुसार लगभग नौ हजार विद्यार्थियों ने जिंदगी से हार मान ली। कहना गलत नहीं होगा कि साल-दर-साल  बच्चों पर पढ़ाई का दबाव और ये चिंतनीय आंकड़े बढ़ ही रहे हैं।
हमारे परिवेश में बच्चों को असफल होने के हालातों से सामना करना सिखाया ही नहीं जाता। तभी तो परीक्षा परिणाम मन मुताबिक न आए, तो वे अवसाद का शिकार हो जाते हैं। नंबर रेस में थोड़ा पीछे रह जाने को भी हमारे यहां एक बड़ी कमजोरी की तरह देखा जाता है, जबकि यह कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है। कोई भी परीक्षा जिंदगी का आखिरी इम्तिहान नहीं होती है। यही वजह है कि बच्चे रिजल्ट आने के समय भी कई चिंताओं से घिरे रहते हैं। यही तनाव कई बार आत्महत्या जैसा कदम उठाने की वजह बन जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, पिछले 45 वर्षो में विश्व भर में आत्महत्या की दर 60 फीसदी बढ़ गई है। हमारे देश में आत्महत्या की दर 10 एशियाई देशों में सबसे ज्यादा है। भारत में हर चार में से एक किशोर मानसिक अवसाद से पीड़ित है जो कि आमतौर पर पढ़ाई के दबाव और बेहतर नतीजे लाने के तनाव का ही परिणाम है।
विडंबना ही है कि हमारे देश में 15 से 29 वर्ष के लोगों की आत्महत्या का दर सबसे अधिक है। हमारे सामाजिक-पारिवारिक परिवेश में पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए किशोरों को स्कूल और अभिभावकों का लगातार दबाव झेलना पड़ता है। कई बार अभिभावकों की अवास्तविक उम्मीदें बच्चों के मन जीवन के लिए बोझ भी बन जाती हैं। जब बच्चे  इन आशाओं को पूरा नहीं कर पाते तो निराश और हताश महसूस करते हैं। यह असहनीय दबाव उनके जीवन से हार जाने का एक बड़ा कारण बनता है। बच्चों से अपेक्षाएं इतनी ज्यादा हैं कि कई बच्चे तो नतीजे आने से पहले ही असफल होने डर से आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। यही वजह है कि माहौल को सहज, सहयोगी और संबल देने वाला बनाते हुए अभिभावकों को बच्चों का साथ देना चाहिए। आज के समय में अव्वल आने की दौड़ ने समय से पहले ही बच्चों  की ओर धकेल दिया है। मासूमियत  भरी उम्र में ही बच्चे पहले  से ही भावनात्मक और मानसिक संघर्ष से जूझ रहे हैं। हर हाल में सफलता हासिल करने और सबसे आगे निकलने का यह संघर्ष परीक्षाओं के दिनों में  ही नहीं नतीजे आने के समय भी चरम पर होता है। एनसीआरबी की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक देश में रोजाना 14 साल तक की उम्र के आठ बच्चे आत्महत्या की राह चुन रहे हैं। यानी छोटी उम्र में ही बच्चों को परिवारों में भी सहारा नहीं मिल रहा है। एकल परिवार व कामकाजी अभिभावक बच्चों के मन की जदोद्जहद समझने का समय नहीं निकाल पा रहे हैं। नि:संदेह यह उलझन परीक्षा परिणामों के समय सबसे ज्यादा होती है। ऐसे में अभिभावकों को चाहिए कि इस दौरान अपनी ख्वाहिशों के भार की याद दिलाने के बजाय बच्चों को भावनात्मक संबल देने का प्रयास करें। अभिभावकों को यह समझना होगा कि बच्चों से हर हाल में अव्वल रहने की उम्मीद रखना उन्हें तनाव और अवसाद का शिकार बनाती है।
गौरतलब है कि बीते साल मध्य प्रदेश में बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आने के बाद एक के बाद एक करीब 12 घंटों में ही 12 बच्चों ने आत्महत्या कर ली थी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कुछ बच्चों ने महज इसलिए खुदकुशी कर ली क्योंकि उन्हें 90 प्रतिशत अंक मिलने की उम्मीद थी। यही वजह है कि ऐसे समय पर बच्चों को थामना जरूरी है। यह सच है कि बच्चों से जुड़ी अपेक्षाओं के चलते अभिभावकों  को अपना सपना भी टूटता दिखता है पर यह समय सपनों के लिए नहीं बल्कि बच्चों की सलामती के लिए सोचने का होता है। असफलता हिस्से आए या सफलता मिले। जीवन गतिशील रहता है। हर परिस्थिति में अपने बच्चों का हाथ थामे रहना अभिभावकों का दायित्व भी है आज के समय की दरकार भी। यह संबल बच्चों को हिम्मत के साथ सकारात्मक और सार्थक जिंदगी की ओर मुड़ने में सहायक होता है। अभिभावकों का भावनात्मक सहारा  बच्चों को अतिवादी कदम उठाने से बचा सकता है। समाज के भावी नागरिकों की जिंदगी सहेज सकता है। इसीलिए माता-पिता सजग और सहयोगी बनें क्योंकि बच्चों की परीक्षा का समय असल मायने में अभिभावकों की परीक्षा का समय (Parents’ test time) है।
परीक्षा के समय बच्चों के साथ किया जाने वाला व्यवहार परिणाम आने के वक्त तनाव का रूप लेकर आता है। अभिभावकों को यह बात समझनी जरूरी है कि स्कूली दिनों की परीक्षाएं न तो भविष्य तय करती हैं और न ही कॅरियर बनाने में मार्गदर्शक होती हैं। यह परिक्षाएं सिर्फ ज्ञान बढ़ाने में सहायक होती हैं। आज तक ऐसा कोई पैमाना नहीं बना है, जो बच्चे के ज्ञान को साबित कर सके। ऐसे कई महापुरुष हुए हैं, जो अपने जीवन में न जाने कितनी बार असफल हुए, मगर आज पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा बने हैं। आज भी स्कूल में उनके जीवन से जुड़ी गाथा बच्चों को सुनाई जाती है। इसलिए यह कहना है कि एक परीक्षा में सफल नहीं हुए तो जिंदगी खत्म हो गई, गलत होगा। यह बात बच्चे तो समझते हैं, मगर उनके माता-पिता नहीं। अपने जीवन में असफलता झेल चुके लोग जब बच्चों पर उम्मीदों का बोझ डालते हैं, तो वे उसे सहन नहीं कर पाते और अवसाद में चले जाते हैं।
कुल मिलाकर, यह माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को किस दिशा में ले जाना चाह रहे हैं। उन्हें जीवन की परीक्षा में पास करना है या स्कूली परीक्षा में। मगर यह बात भी तय है कि अगर वे दबाव में ही सही माता-पिता की उम्मीदों को एक बार तो पूरा कर देंगे, मगर बाद में वे मेहतन से जी चुराने लगेंगे या फिर सफलता का कोई शार्टकट तलाश करने लग जाएंगे। यह कवायद अंतत: बच्चों को विफलता की ओर ले जाएगी और आगे चलकर वे दूसरे बच्चों की अपेक्षा पीछे छूट जाएंगे।

डॉ. मोनिका शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)

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