अस्पतालों की दूर की जाए बदहाली


राजएक्सप्रेस, भोपाल। Kanpur Hospital Negligence Case: देश के अस्पतालों में लापरवाही थमने का नाम नहीं ले रही है। अब कानपुर इसका उदाहरण बना है। जहां आईसीयू का एसी खराब होने से पांच मरीजों की मौत हो गई। इस तरह की लापरवाही का इलाज अब बेहद जरूरी हो गया है, ताकि अस्पताल मौत न बांटने पाएं।
पिछले साल गोरखपुर में अस्पताल की लापरवाही के बाद कई बच्चों ने अपनी जान गंवा दी थी, लेकिन सरकारों ने इससे कोई सबक नहीं सीखा। गोरखपुर की घटना के बाद एक के बाद एक राज्यों के अस्पतालों ने मानवता को शर्मसार किया। अब यूपी के ही कानपुर के सबसे बड़े अस्पताल में आईसीयू का एसी खराब होने से पांच मरीजों की मौत हो गई। हालांकि, मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य का दावा है कि आईसीयू में मरने वाले लोग पहले से ही सीरियस थे। पांच लोगों की मौत के बाद प्रशासन हरकत में आया जिसके बाद डीएम कानपुर ने आनन-फानन में आईसीयू में दो पावर एसी लगवाए। हालत ये ही कि आईसीयू में भर्ती मरीज अब घर से पंखा लाकर इलाज करवा रहे हैं। आईसीयू में तैनात नर्सो का कहना है कि कई दिनों से ही एसी खराब है, हमने लिखित शिकायत दी है लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है। अब सवाल यह है कि किसे सही माना जाए। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को या फिर नर्सो को। जो भी हो, यह मामला बेहद संवेदना का है, इसे आरोप-प्रत्यारोप के दायरे में लाकर खत्म नहीं किया जा सकता।
गोरखपुर में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। घटना के बाद हालात को नियंत्रण में लाने के बजाय सभी ने आरोप-प्रत्यारोप शुरू कर दिए थे। नतीजा आज सामने है। जरूरत है अस्पतालों में इस तरह की संवेदनहीनता को खत्म करने की। यह तभी होगा, जब सरकारें अपनी लापरवाही छिपाने के बजाए उसे जाहिर करेंगी और उसे दूर करने के प्रयासों पर अमल करेंगी। गोरखपुर की घटना के ठीक बाद रायपुर से भी तीन नवजात शिशुओं की जान जाने की घटना सामने आई थी। सवाल यह भी है कि सरकारी अस्पतालों में ऐसी आपराधिक लापरवाही क्या इसलिए बरती जाती है कि वहां इलाज के लिए जाने वाले अमूमन सभी लोग गरीब तबके के होते हैं और अपने साथ होने वाली नाइंसाफी को चुपचाप सह लेते हैं? किसी भी अस्पताल में मरीजों की तीमारदारी के लिए तैनात कर्मचारियों में पेशेवर कुशलता के साथ-साथ संवेदनशीलता भी जरूरी है। वे अपनी ड्यूटी में जरा भी लापरवाही नहीं बरतें, यह सुनिश्चित होना अनिवार्य है। यों अस्पताल में आए मरीजों और उनके परिजनों का यह अधिकार भी है कि वे वहां के कर्मचारियों से सेवा की कसौटी पर खरा उतरने की उम्मीद करें।
भारत की गिनती दुनिया के उन देशों में होती है जहां स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बहुत कम होता है। भारत में यह डेढ़ फीसद से भी कम है, जबकि चीन में तीन फीसद से ज्यादा। इसलिए भारत में सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था हमेशा संसाधनों और कर्मियों की तंगी से जूझती रहती है। जननी सुरक्षा व राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाएं भी पर्याप्त आवंटन न मिलने का दंश झेलती रहती हैं। फिर, भ्रष्टाचार व बदइंतजामी की मार ऊपर से। लेकिन भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र एक और बड़ी बीमारी से ग्रसित है और वह बीमारी है लापरवाही। यह सरकारी अस्पतालों में भी दिखती है और निजी में भी।

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