काला के संदेश को समझें हम


राजएक्सप्रेस, भोपाल। हर फिल्म की बनावट पर अपने समय, काल और परिस्थितियों की छाप जरूर होती है लेकिन हाल ही में आई रजनीकांत की फिल्म ‘काला’ (Rajinikanth Film Kaala) इससे आगे बढ़कर अपना सांस्कृतिक प्रतिरोध दर्ज कराती है, यह अपनी बुनावट में सदियों से अपना वर्चस्व जमाये बैठे ब्राह्मणवादी संस्कृति की जगह दलित बहुजन संस्कृति को पेश करती है और पहली बार मुख्यधारा की कोई फिल्म बहुजनों के आत्मा की बात करती है। यह फिल्म जो संदेश देना चाह रही है, उसे आत्मसात करना ही होगा।
‘पुरोहितों ने पुराणों की प्रशंसा लिखी है। कम्युनिस्टों और विवेकवादी कई लेखकों ने इन पुराणों की टीकायें लिखी हैं, लेकिन किसी ने भी यह नहीं सोचा कि हमारी भी कोई आत्मा है जिसके बारे में बात करने की जरूरत है।’ (कांचा इलैया की किताब “मैं हिन्दू क्यों नहीं हूं से) फिल्में मुख्य रूप से मनोरंजन के लिए बनायी जाती हैं लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखने में फिल्मों की भी भूमिका से इनकार नही किया जा सकता है। हर फिल्म की बनावट पर अपने समय, काल और परिस्थितियों की छाप जरूर होती है लेकिन हाल ही में आई रजनीकांत की फिल्म ‘काला’ इससे आगे बढ़कर अपना सांस्कृतिक प्रतिरोध दर्ज कराती है, यह अपनी बुनावट में सदियों से अपना वर्चस्व जमाये बैठे ब्राह्मणवादी संस्कृति की जगह दलित बहुजन संस्कृति को पेश करती है और पहली बार मुख्यधारा की कोई फिल्म बहुजनों के आत्मा की बात करती है।
भारतीय समाज और राजनीति का यह एक उथल पुथल भरा दौर है जिसे काला बहुत प्रभावी ढंग से कैच करती है। एक तरफ जहां हिंदुत्व के भेष में ब्राह्मणवादी ताकतें अपनी बढ़त को निर्णायक बनाने के लिए नित्य नए फरेबों और रणनीतियों के साथ सामने आ रही हैं जिससे संविधान की जगह एक बार फिर मनु के कानून को स्थापित किया जा सके, इस दौरान राज्य के संरक्षण में दलितों और अल्पसंख्यकों पर हिंसा के मामलों और तरीकों में भी इजाफा हुआ है। वहीं दूसरी तरफ देश में दलितों के अधिकार, अस्मिता व आत्मसम्मान की लड़ाई में भी नई धार देखने को मिल रही है। दलित आंदोलन प्रतिरोध के नए-नए तरीकों, चेहरों और रंगों के साथ मिलकर चुनौती पेश कर रहा है, फिर वो चाहे, जिग्नेश मेवाणी, चंद्रशेखर रावण जैसे चेहरे हों या आजादी कूच, भीमा-कोरेगांव जैसे आंदोलन’ या फिर दलित-मुस्लिम एकता और जय भीम लाल सलाम जैसे नारे। दलित आंदोलन का यह एकनया तेवर और फ्लेवर सीधे हिंदुत्व की राजनीति से टकराता है।
हमेशा से ही हमारी फिल्में पॉपुलर कल्चर के उन्ही विचारों और व्यवहार को आगे बढ़ाती रही है जिसे ब्राह्मणवादी संस्कृति कहते हैं। इसके बरक्स दूसरे विचारों और मूल्यों को न केवल अनदेखा किया जाता है बल्कि कई बार इन्हें कमतर, लाचार या मजाकिया तौर पर पेश किया जाता है, पी.रंजीत की फिल्म काला इस सिलसिले को तोड़ती है और स्थापित विचारों और मूल्यों को चुनौती देती है। वैसे तो ऊपरी तौर पर रजनीकांत की दूसरी मसाला फिल्मों की तरह ही है और इस जैसी कहानियां हम पहले भी कई बार देख-सुन चुके हैं लेकिन इस काला में जिस तरह से इस पुरानी कहानी का पुनर्पाठ किया गया है वह विस्मित कर देने वाला है। काला का स्टैंडपॉइंट इसे खास बनाता है। यह दलित नजरिए को पेश करने वाली फिल्म है। लीड में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग हैं जो किसी के अहसान से नही बल्कि अपनी चेतना से आगे बढ़ते हैं और जमीन को बचाने के लिए व्यवस्था और स्थापित विचारों से टकराते हैं।
आम तौर पर जाति उत्पीड़न जैसे सवाल ही दलितों के मुद्दे के तौर पर सामने आते हैं लेकिन ऊना आंदोलन के बाद से इसमें बदलाव आया है। फिल्म ‘काला’ भी जमीन के अधिकार की बात करती है जो मेरी जमीन और मेरे अधिकार को ही छीनना तेरा धर्म है और ये तेरे भगवान का धर्म है तो मैं तेरे भगवान को भी नहीं छोड़ूंगा जैसे तेवरों के साथ आगे बढ़ती है। यह मुंबई के धारावी करिकालन यानी काला और उसके लोगों की कहानी है, जो ताकतवर नेताओं और भू माफियाओं के गठजोड़ से अपने अस्मिता और जमीन को बचाने की लड़ाई लड़ते हैं। उनके सामने जो शख्स है उसे गंदगी से नफरत है और वो धारावी को स्वच्छ और डिजिटल बना देना चाहता है। देखा जाए, तो उदारीकरण के बाद से भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया में बहुत तेजी आई है और आज देश के बड़ी जनसंख्या शहरों में रहती है जिनमें से एक बड़ी आबादी झुग्गी-झोपड़ियों में ही रहने के लिए मजबूर है, इनमें से ज्यादातर लोग दलित, आदिवासी आर मुस्लिम समुदाय के लोग है। कभी यह माना जाता था कि शहरीकरण से जातिप्रथा को खत्म किया जा सकता है। झुग्गियों में रहने वाली आबादी शहर की रीढ़ होती है जो अपनी मेहनत और सेवाओं के बल पर शहर को गतिमान बनाए रखती है लेकिन झुग्गी-बस्तियों में रहने वालों को शहर पर बोझ माना जाता है, शहरी मध्यवर्ग जो ज्यादातर स्वर्ण है उन्हें गंदगी और अपराध का अड्डा मानता है।
भारत में त्वचा के रंग पर बहुत जोर दिया जाता है, बच्चा पैदा होने पर मां-बाप का ध्यान सबसे पहले दो बातों पर जाता है, शिशु लड़का है या लड़की और उसका रंग कैसा है, गोरा या काला। फिल्म काला इस सोच पर चोट करती है और काले रंग को महिमामंडित करती है, फिल्म का नायक जिसके त्वचा का रंग काला है काले कपड़े भी पहनता है जबकि खलनायक उजले कपड़ों में नजर आता है। काला का सांस्कृतिक प्रतिरोध जबरदस्त है। धारावी एक तरह से रावण की लंका का प्रतीक है, यहां भी लंका दहन की तरह धारावी भी जलाया जाता है, खलनायक के घर रामकथा चलती है लेकिन इसी के समयांतर फिल्म के नायक को रावण की तरह पेश किया जाता है, क्लाइमैक्स में जब खलनायक हरि अभ्यंकर को मारते हंै तो उसी के साथ रावण के दस सिर गिरने की कहानी भी सुनाई जाती है। हाथ मिलाने से इक्वॉलिटी आती है, पांव छूने से नहीं जैसे डायलाग ब्राह्मणवादी तौर तरीकों पर सीधा हमला करते हैं।
इसी तरह से काला के एक बेटे का नाम लेनिन है और उनकी पूर्व प्रेमिका मुस्लिम है जो अपने आप में बिना कुछ कहे ही एक संदेश देने का काम करते हैं, अंत में रंगों के संयोजन को बहुत ही प्रभावी तरीके से पर्दे पर उकेरा गया है जिसमें एक के बाद एक काला, नीला और लाल रंग एक दूसरे में समाहित होते हुए दिखाए गए हैं। काला फिल्म हमारे समय की राजनीतिक बयान है जिसका एक स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड है और जो अपना मुकाबला ब्राह्मणवाद और भगवा राजनीति से मानती है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसे बार-बार कोड किए जाने की जरूरत है। काला के जरिए समाज को जो संदेश देने की उम्मीद निर्माताओं ने जताई थी, वह फलीभूत होती भी दिख रही है। काला को लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं, वह इस बात का उदाहरण है। देश में दलितों के साथ हो रहे अत्याचार और हिंसा की सच्चई की बानगी दर्शाती यह फिल्म जो संदेश देना चाह रही है, उसे देश ओर समाज को बिना सोच-विचार किए आत्मसात करना ही होगा। रजनीकांत की यह अब तक की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक मानी जा रही है, तो ऐसे ही नहीं।

जावेद अनीस (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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