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युवाओं में बढ़ रही है तंबाकू की लत, जो देश और समाज दोनों के लिए घातक

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अभी चार फरवरी को ही पूरी दुनिया ने विश्व कैंसर दिवस मनाया, भारत ने भी। इस दिन लोगों को कैंसर के प्रति जागरूकता का रटा-रटाया पाठ पढ़ाया गया। स्वस्थ जीवनशैली और बेहतर खानपान के प्रति सजग किया गया और तंबाकू के उत्पादों से दूर रहने की नसीहतें दी गईं। इस तरह की कवायदें हर साल की जाती हैं, लेकिन फर्क आज तक नहीं दिखा। अभी कुछ दिन पहले देश में किए गए एक सर्वे में कहा गया कि युवाओं में सिगरेट पीने की लत में कमी आई है और सिगरेट की बिक्री कम हुई है। यह सर्वे वाकई देश और समाज के लिए बेहतर संदेश था, मगर सिगरेट के बाद दूसरे अन्य तंबाकू उत्पादों के बढ़ावे की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। अब तो हालत यह है कि तंबाकू की तरफ युवा तेजी से बढ़ रहे हैं। जब तक हम तंबाकू पर पूरी तरह रोक नहीं लगा पाते, तब तक कैंसर दिवस की औपचारिकता को पूरी नहीं कर पाएंगे, क्योंकि तंबाकू के सेवन से न सिर्फ कैंसर बल्कि दूसरी बीमारियों से देश का युवा बीमार हो रहा है। देखा जाए, तो तंबाकू की लत बहुत पुरानी है, लेकिन कुछ सालों पहले तक यह बुजुर्गो अथवा बड़ी उम्र के पुरुषों तक ही सीमित थी, मगर चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि अब त...

ऐलानों के आईने में दमदार है बजट, कुछ उम्मीदें तो जगाता ही है अब सरकार उस पर तेजी से अमल करे

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मौजूदा केंद्र सरकार का आखिरी पूर्ण बजट कुछ ऐसा ही होना था, इसलिए ऐलानों और योजनाओं के लिहाज से देखें तो यह न केवल आकर्षक है, बल्कि भविष्योन्मुखी भी दिखता है। बजट में किसानों के उत्थान की मंशा दिखती है भले अभी रूपरेखा बहुत स्पष्ट न हो। हालांकि, रूपरेखा का महत्वपूर्ण होना भी बहुत जरूरी है क्योंकि अंतत: नतीजे वही देगी। फिर भी कहना चाहिए कि वित्त मंत्री अरुण जेटली साल 2018-19 के बजट में किसानों की बेहतरी के लिए कई विश्वसनीय कदम उठाते दिखे हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सरकार ने आगामी खरीद की फसलों को उत्पादन लागत से कम-से-कम डेढ़ गुना कीमत पर लेने का फैसला ले लिया है। हालांकि, उस लागत में किसान के श्रम की लागत का भी आकलन होगा या नहीं यह तो लागत मूल्यों के ऐलान के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इस घोषणा से यह बात स्पष्ट हुई है कि किसान अब सचमुच सरकार की प्राथमिकता में आया है, अगर यह सरकार की नजर में महज चुनावी साल के पहले की सतर्कता भर नहीं है तो। मोदी सरकार अपने गठन के बाद से ही कह रही है कि वह 2022 तक देश के किसानों की आमदनी बढ़ाकर दोगुना कर देगी, लेकिन अभी तक उन उपायों का खुलासा...

आम बजट में रेलवे की सेहत सुधारने के लिए वित्त मंत्री ने वह सब किया, अब रेलवे को सुरक्षा और विकास पर जोर देना होगा

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नए भारत के सपने को साकार करने के लिए सरकार ने रेलवे में सुरक्षा को मजबूत करने, यात्री सुविधाओं को बेहतर बनाने और लंबित विकास योजनाओं को चरणबद्ध तरीके से गति प्रदान करने पर बल दिया है। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने गुरुवार को संसद में वित्त वर्ष 2018-19 के लिए प्रस्तुत आम बजट में समुचित प्रावधान किए हैं। उन्होंने नए वितीय वर्ष के लिए बजट आवंटन में पांच फीसदी की बढ़ोतरी करके उसे एक लाख 48 हजार 528 करोड़ रुपए करने की घोषणा की है। दरअसल, आम बजट में रेल बजट को मिलाए जाने से लोगों के मन में जो दुविधाएं थीं, उसे समाप्त करने की पूरी कोशिश मोदी सरकार ने की है। लिहाजा, अब यह स्पष्ट हो गया है कि बजट के दूसरे नए स्वरूप में रेलवे में कतिपय चमत्कार किए गए हैं, जिससे रेलवे के पुनर्निर्माण और उसकी यात्री सुविधाओं की पुरानी स्थिति की जड़ता को तोड़ने में भारी कामयाबी भी मिली है। नि:संदेह, मोदी सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है क्योंकि रेलवे की सेहत को गठबंधन सरकारों के दौर की राजनीतिक लोकलुभावन घोषणाओं से जो निरंतर क्षति पहुंच रही थी, उस पर भी मौजूदा सरकार ने लगभग विराम लगा दिया है। बेशक,...

देश व समाज में बेटियों के प्रति हो रहे दोगलेपन को खत्म करना होगा, बेटियों के प्रति सोच बदलें हम

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बजट से पहले पेश होने वाले आर्थिक सर्वेक्षण में पहली बार लड़का और लड़की में भेद करने के सामाजिक पहलू को उजागर किया गया है। सर्वे में कहा गया है कि एक परिवार तब तक संतान पैदा करता रहता है, जब तक उसके यहां बेटा नहीं हो जाता। लेकिन यह सोच देश पर कितनी भारी पड़ रही है, इसका अंदाजा किसी को नहीं है। एक अदद लड़के की चाहत में देश में 2.1 करोड़ ‘अनचाही’ लड़कियां पैदा हुईं। आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में यह बात कही गई है। सर्वे के अनुसार यह अनुमानित आंकड़ा उन लड़कियों का है, जो बेटे की चाह के बावजूद पैदा हुई हैं या जब अभिभावकों ने अपनी इच्छा के अनुसार बेटों की संख्या होने पर बच्चा पैदा नहीं करना चाहा था। यही नहीं 6.3 करोड़ गायब बेटियों का आंकड़ा भी सर्वे में दिया गया है। कहने का अर्थ यह है कि गर्भ में बेटी होने के कारण 6.3 करोड़ भ्रूणों की हत्या हुई। हर साल लगभग 20 लाख ऐसी बेटियां गायब हो जाती हैं। बेटों की चाह में बेटियों से हो रहा दोगलापन ही देश और समाज को आगे बढ़ाने में बाधक है, जबकि आज बेटियों को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। बेटियां आज हर क्षेत्र में बेटों के मुकाबले डटी हैं। सेना हो ...

बजट सत्र के पहले दिन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया, बेहतरी के साथ ही महंगाई की आहट

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अपने चौथे व आखिरी पूर्णकालिक बजट से पहले पेश आर्थिक समीक्षा में केंद्र सरकार ने जीएसटी के असर और कच्चे तेल के दाम में बढ़ोतरी के बाबत महंगाई बढ़ने की तरफ इशारा किया है। सोमवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2018 का आर्थिक सर्वे संसद में पेश किया। इस आर्थिक सर्वे में जीएसटी के असर से लेकर भारतीयों में लड़के की चाहत से जुड़े 10 नए आर्थिक तथ्यों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। समीक्षा में सरकार ने माना है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम दिया है। इसके नए आंकड़े उभर कर सामने आए हैं। अप्रत्यक्ष करदाताओं की संख्या में 50 फीसदी का इजाफा हुआ है। नई कर प्रणाली अपनाने से प्रमुख उत्पादक राज्यों के कर संग्रह में कमी आने की आशंका भी निराधार साबित हुई है। ऐसा इसलिए क्योंकि अब राज्यों के बीच जीएसटी आधार के वितरण को उनकी अर्थव्यवस्थाओं के आकार से जोड़ दिया गया है। इसी तरह नवंबर 2016 यानी नोटबंदी से लेकर अब तक व्यक्तिगत आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या में 18 लाख की वृद्धि दर्ज की गई है। इस समीक्षा रिपोर्ट में नोटबंदी का जिक्र कहीं नहीं है। ऐसे में यह ...

भारत भले ही10 सबसे असुरक्षित देशों की सूची में शामिल न हो, लेकिन देश में सुरक्षित माहौल बड़ी चुनौती

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ग्लोबल ट्रैवल एंड टूरिज्म ने हाल ही में असुरक्षित देशों की रैंकिंग जारी की है। असुरक्षित देशों की इस सूची में भारत का 13वां स्थान है। हालांकि, भारत असुरक्षित देशों की टॉप-10 सूची में तो शामिल नहीं है, लेकिन 13वां स्थान भी कम डराने वाला नहीं है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि देश में किस तेजी से अपराध बढ़ रहे हैं और यहां कोई भी सुरक्षित नहीं है। यदि हम बात बच्चों की ही करें, तो पिछले कुछ वर्षो से बच्चों के प्रति अपराधों में बड़ी तेजी से वृद्धि हुई है। बच्चों का अपहरण करने के साथ ही साथ उनके साथ जघन्य अपराध भी किए जा रहे हैं। यूं बच्चों को भगवान की सबसे बड़ी और सबसे प्यारी नेमत माना जाता है। इन मासूम बच्चों को देख हर कोई अपनी आपसी रंजिश और द्वेष को झट से त्याग देता है। बावजूद इसके भारतीय समाज में कुछ सिरफिरे लोग ऐसे भी हैं, जो बच्चों को भी शिकार बना डालते हैं। आजकल देशभर में इन मासूम बच्चों के लगातार गायब होने के बढ़ते मामले भारतीय समाज पर बड़ा सवालिया निशान लगा रहे हैं। आखिरकार देशभर में हर साल इतनी बड़ी संख्या में बच्चे कैसे गायब हो रहे हैं, वह भी चार से 15 वर्ष की उम्र के मा...

समाज में अपनों से ही शर्मसार होती मानवता बेहद निराशाजनक

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Human society:  राजधानी दिल्ली में 2017 की आपराधिक गतिविधियों में पुलिस ने इसी माह जारी आंकड़ों में कहा है कि रेप के 97% मामलों में महिलाएं अपनों की ही शिकार होती है। दिल्ली ही नही यह तस्वीर सारे विश्व में देखने को मिलेगी। अपनों से मतलब साफ है कि या तो रिश्तेदार या जान-पहचान वाले या फिर दोस्त। रेप के मामलों में ले देकर यही निकल के आता है कि रेप करने वाला आरोपी और रेप पीड़िता एक दूसरे को जानते हैं। जानपहचान का ही फायदा उठाते हुए यह महिलाओं को अपना आसानी से शिकार बना लेते हैं। यह दूसरी बात है कि गाहे बेगाहे निर्भया जैसे कांड अंजान लोगों द्वारा कर दिए जाते हैं और मीडिया की सुर्खियां बन जाते हैं। निर्भया जैसे कांड होते ही सरकारी, गैरसरकारी संगठन और ना जाने कौन-कौन आगे आकर झकझोरने की कोशिश में जुट जाते हैं। यहां निर्भया जैसे कांड को कमतर देखने की कतई मंशा नहीं है और इस तरह की घटनाओं की जितनी निंदा की जाए वो कम है और यह भी कि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृति ना हो इसके लिए कठोर कदम उठाए जाने चाहिए। अखबारों में प्रतिदिन कोई ना कोई खबर रेप या छेड़छाड़ की आती ही है जो अपने आप में गंभीर व म...