कश्मीर समस्या भारत और पाक के बीच, फारूक पर महबूबा का गुस्सा उचित



जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और राज्य के भूतपूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला को फटकार दिया है। उनका यह रुख एकदम स्वाभाविक है, क्योंकि फारूक ने हाल ही में जो बयान दिया था, वह कश्मीर समस्या को लेकर भारत की उस नीति के खिलाफ था, जिस पर हम आजादी के बाद से ही चल रहे हैं। वह नीति यह है कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच का एक द्विपक्षीय मसला है, जिसमें तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है। शुरुआत में हमारे इस रुख के पक्ष में ब्रिटेन और अमेरिका जैसे ताकतवर देश नहीं थे। संयुक्त राष्ट्रसंघ भी नहीं मानता था कि कश्मीर समस्या भारत और पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मसला है। वह बस सोवियत संघ था, जो हमारे रुख का समर्थन करता था।
लेकिन धीरे-धीरे चीजें हमारे पक्ष में होती चली गई हैं। 1974-75 में ब्रिटेन ने कश्मीर को भारत एवं पाकिस्तान का द्विपक्षीय मसला मान लिया था। यह सही है कि अमेरिका लंबे समय तक ड्रामा करता रहा था, पर तीन दशक पहले उसने भी इस समस्या को द्विपक्षीय मसला मान लिया था। संयुक्त राष्ट्रसंघ भी यही मानकर चलता है कि यह समस्या भारत और पाकिस्तान के बीच की है। यह हमारी बड़ी कूटनीतिक कामयाबी है, जो हमने धीरे-धीरे अर्जित की है, पिछले पांच-साढ़े पांच दशकों में। फारूक अब्दुल्ला का बयान इसी कामयाबी पर एक प्रहार था।
उन्होंने कहा यह था कि भारत को पहल करके एक तीसरे पक्ष को इस समस्या से जोड़ना चाहिए। वह पक्ष ऐसा हो, जो भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत कराए। फारूक अब्दुल्ला ने दो नाम भी सुझाए थे-चीन या अमेरिका का। हमें पता ही है कि चीन के सिर पर इस समय विश्व की महाशक्ति बनने का भूत सवार है। इसलिए उसने पिछले दिनों कहा था कि वह कश्मीर के समाधान में मध्यस्थता करने के लिए तैयार है। पाकिस्तान ने उसके इस बयान का स्वागत भी किया था, जबकि हमने उसे फटकार दिया था। हमें यह भी पता है कि अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति अब तक स्पष्ट नहीं हुई है। अपने रक्षा मंत्रलय पेंटागन के भारी दबाव के कारण वे पटरी पर आ तो रहे हैं, मगर वापसी की उनकी रफ्तार बहुत धीमी लग रही है। एक समय उन्होंने भी यह बयान दिया था कि भारत और पाकिस्तान अगर चाहें तो अमेरिका कश्मीर समस्या के समाधान में मदद कर देगा। जाहिर है कि उनका इरादा भी मध्यस्थता करने का ही था। पाकिस्तान ने उनके बयान का भी स्वागत किया था, जबकि भारत ने उन्हें भी चुप करा दिया था। इसीलिए अब जबकि फारूक अब्दुल्ला ने मध्यस्थता का गाना गा दिया, तो उसका मतलब भी यही समझ में आया कि वे पाकिस्तान की भाषा बोलने लगे हैं।
सच तो यह है कि उन्होंने सिर्फ पाकिस्तान की भाषा नहीं बोली है, बल्कि यह वह भाषा भी है, जो कि चीन को तक पसंद आई होगी। चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तानी राजदूत ने हाल ही में दिल्ली में भूटान के राजदूत से भेंट की। माना यह जा रहा है कि उन्होंने डोकलाम विवाद के संदर्भ में चीन का पक्ष ही भूटान के राजदूत को बताया होगा। गौरतलब है कि भूटान और चीन के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं कि दोनों में सीधी बात होने की गुंजाइश होती। सो, बीजिंग का इशारा पाकर पाकिस्तानी राजदूत ने भूटान के राजदूत से मुलाकात की होगी। इसके पीछे कोशिश भूटान को चीन के पक्ष में लाने की रही होगी, जो कि अभी हमारे पक्ष में खड़ा है।
एक तरफ तो चीन और पाकिस्तान हमारे खिलाफ मिलकर षड्यंत्र कर रहे हैं, तो दूसरी ओर हमारे ही देश का एक नेता (फारूक अब्दुल्ला) ऐसा बयान देता पाया गया, जिससे हमारे शत्रुओं का पक्ष मजबूत हुआ, तो देश का गुस्सा बिलकुल स्वाभाविक है। अभी हाल ही में महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि कश्मीर पाकिस्तान की हरकतों का खामियाजा तो लंबे समय से भोग रहा है, पर अब वहां चीन भी अपना दखल बढ़ा रहा है। हो सकता है कि उनका यह बयान सही न हो। यह इसलिए कि जिस आतंकवाद से हमारा कश्मीर जूझ रहा है, उससे भी खतरनाक आतंक से चीन का सिक्यांग जूझ रहा है। चीन को यह पता तो होगा ही कि अगर उसने कश्मीर में दखल दिया तो भारत सिक्यांग में दखल देगा, क्योंकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत जैसे को तैसा की दृढ़ रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। हम देख सकते हैं कि हमारी सरकार पाकिस्तान की शर्तो पर पाक और चीन की शर्तो पर चीन से बात करने हेतु तैयार नहीं है। ऐसे में चीन कश्मीर में आग से तो खैर नहीं खेलेगा। वह केवल पाकिस्तान को उकसाता रहेगा और इससे ज्यादा कुछ भी नहीं करेगा। अत: महबूबा मुफ्ती का कश्मीर में चीन का दखल बढ़ने संबंधी बयान सही नहीं लगता है। इसके बावजूद हमारे देश के किसी भी नेता को ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए, जिससे चीन या पाकिस्तान को ताकत मिले और जिससे जम्मू कश्मीर पर भारत का पक्ष कमजोर पड़े। फारूख अब्दुल्ला ने यही अपराध किया, जिसे देशद्रोह की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
इस स्थिति में महबूबा मुफ्ती ने उन्हें जो जवाब दिया है, वह बेहद सटीक है। उन्होंने कहा कि कश्मीर भारत का अंदरूनी मामला है, जिसे सुलझाएंगे। दुनिया के जिस देश में महाशक्तियों ने दखल दिया है, वहां गृहयुद्ध जैसे हालात बन गए। यदि सीरिया आज हिंसा और अराजकता से जूझ रहा है तो इसका कारण उसकी अंदरूनी समस्याओं में महाशक्तियों का दखल है। उन्होंने यह भी कहा है कि अपने राजनीतिक स्वार्थो के लिए फारूक अब्दुल्ला कश्मीर समस्या के समाधान में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका को स्वीकारने जैसा बयान कैसे दे सकते हैं? इससे देश ने यह बात समझ ली है कि राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में फारूक अब्दुल्ला ने कश्मीर, कश्मीरियों एवं देश के प्रति कितनी गलत भूमिका निभाई होगी। उन्होंने कश्मीरियों का हित किया होगा या नहीं? वे किसका हित साधते होंगे, पता नहीं।
यदि हम महबूबा मुफ्ती के बयान का भावार्थ समझें तो साफ होता है कि उन्होंने फारूक अब्दुल्ला पर पाकिस्तान के हित साधने का आरोप लगाया है, पाक का नाम लिए बिना ही। नाम तो उन्होंने अमेरिका का भी नहीं लिया, लेकिन सीरिया के गृहयुद्ध के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहरा दिया है, जो कि सही भी है। चीन का नाम वे अपने पहले के बयान में ले चुकी थीं, इसलिए इसमें उसका नाम भी नहीं आया। लेकिन उन्होंने फारूक के मध्यस्थता के प्रस्ताव को खारिज करके भारत का ही पक्ष मजबूत किया है। इसके लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए। साथ ही डॉ. फारूक अब्दुल्ला से जवाब मांगा जाना चाहिए कि वे मध्यस्थता के उस जिन्न को बोतल से बाहर क्यों निकालना चाहते हैं, जिसे भारत ने बहुत परिश्रम के बाद बोतल में बंद किया था? अगर उनके खिलाफ कार्रवाई भी हो तो अति-उत्तम!

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