गंभीर जल संकट की आहट


आज विश्व जल दिवस (World Water Day)है, मगर हमारी लापरवाही और पानी बचाने के प्रति सजगता न दिखाया जाना, गंभीर संकट की ओर इशारा कर रहा है। दुनिया भर की सरकारों को पानी की आपूर्ति और गुणवत्ता बेहतर करने के लिए हरित नीति पर जोर देना चाहिए क्योंकि जलवायु परिवर्तन और बढ़ती वैश्विक जनसंख्या के चलते अरबों लोगों के समक्ष पानी का संकट उत्पन्न हो गया है। अगर हम अब भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ी के लिए विनाश का कारण बनेंगे।
भारत में ‘जल ही जीवन है’ का मुहावरा काफी प्रचलित है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ देश की अधिकांश जनसंख्या को पता नहीं है, क्योंकि वे पानी के महत्व को न ठीक से समझते हैं न ही ठीक से समझना चाहते हैं। पानी के बिना जिंदगी की क्या स्थिति हो जाती है इसे पिछले कुछ महीनों से केपटाउन में आए भयंकर जलसंकट से समझा जा सकता है। जहां भंयकर जल संकट की वजह से आपातकाल जैसे हालात हो गए हैं। वह दिन दूर नहीं जब करीब 40 लाख की आबादी वाले इस शहर का पानी पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। इस दिन को कुछ लोग ‘डे जीरो’ कह रहे हैं। डे जीरो यानी जिस दिन पानी मिलना बिल्कुल ही बंद हो जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार इसी साल अप्रैल में यह शहर पूर्ण रूप से जलविहीन हो सकता है। पर्यटकों से भरे रहने वाले इस शहर में पानी की किल्लत इस कदर हो गई है कि चाहे बुजुर्ग हों या बच्चे, पानी लेने के लिए रात भर कतार में खड़े रहते हैं।
पिछले तीन साल से यहां बारिश नहीं हुई है। इसके चलते शहर के लगभग सारे जल स्त्रोत सूख चुके हैं। जो बचे हैं, उनसे बहुत ही सीमित मात्रा में पानी की आपूर्ति की जा रही है। वहां की सरकार ने जल वितरण के सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षाबलों को तैनात कर रखा है। हालात ऐसे हो गए हैं कि लोगों को सप्ताह में सिर्फ दो बार नहाने और शौचालय में फ्लश के लिए टंकी के पानी का उपयोग करने पर रोक लगा दी गई है। केपटाउन में होने वाले गंभीर जल संकट से भारत जैसे देशों को सीख लेने की सख्त जरूरत है क्योंकि हमारे देश में भी कई शहर गंभीर जल संकट से गुजर रहे हैं। पिछले दिनों एक वैश्विक संस्था नेचर कंजरवेंसी ने साढ़े सात लाख से अधिक आबादी वाले 500 शहरों के जल ढांचे का एक अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला था कि भारत के भी कई शहर गंभीर जल संकट की स्थिति से गुजर रहे हैं और और अगर समय रहते इसके लिए प्रबंध नहीं किए गए तो आने वाले समय में यहां विकराल स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
देश के कई छोटे और मझोले शहरों के साथ ही दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुर और हैदराबाद जैसे बड़े महानगर भी जल संकट से जूझ रहे हैं। देश में पानी के अधिकांश स्थानीय स्रोत सूख चुके हैं या उनका अस्तित्व नहीं रह गया है। सैकड़ों छोटी नदियां विलुप्ति की कगार पर हैं। देश के अधिकांश गांव और कस्बों में तालाब और कुएं भी बिना संरक्षण के सूखते जा रहे हैं। कुल मिलाकर देश में जल संकट और जल संरक्षण को लेकर संजीदगी नहीं दिख रही है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने विश्व के सभी देशों को चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि पानी की बर्बादी को जल्द नहीं रोका गया तो परिणाम घातक होंगे। दुनिया की आबादी जिस तरह से बढ़ रही है सबको स्वच्छ पेयजल मुहैया कराना सभी देशों खासकर विकासशील देशों के लिए एक चुनौती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार, दुनिया भर में 86 फीसदी से अधिक बीमारियों का कारण असुरक्षित व दूषित पेयजल है।
वर्तमान में 1600 जलीय प्रजातियां जल प्रदूषण के कारण लुप्त होने की कगार पर है। विश्व में 1.10 अरब लोग दूषित पेयजल पीने को मजबूर हैं और साफ पानी के बगैर अपना गुजारा कर रहे हैं। भारत के कई हिस्सों में पेयजल किल्लत इस कदर बढ़ गई है कि उसका लाभ उठाने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां आगे आ गई हैं। कुछ ने जमीन से पानी निकाल कर तो कुछ ने सामान्य जल आपूर्ति के जरिये मिलने वाले पानी को ही बोतल बंद रूप में बेचना शुरू कर दिया है। देश में बोतल बंद पानी का व्यवसाय लगातार बढ़ता जा रहा है। नि:संदेह यह कोई खुशखबरी नहीं। तमाम शहरी इलाकों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में औसत गृहणियों का अच्छा-खासा समय पेयजल एकत्रित करने में बर्बाद हो जाता है। चिंताजनक यह है कि इस स्थिति में सुधार होता नहीं दिखता। पेयजल के मामले में ऐसे चिंताजनक हालात तब हैं जब पानी पर अधिकार जीवन के अधिकार के बराबर है।
सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे हर नागरिक को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराएं, लेकिन वे इसके लिए सजग नहीं। भारत में पेयजल संकट बढ़ती आबादी और कृषि की जरूरतों के कारण भी गंभीर होता जा रहा है। करीब 65-70 प्रतिशत जल कृषि कार्यो में खप जाता है। इसके अतिरिक्त उद्योगों के संचालन में भी जल का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। विडंबना यह है कि न तो उद्योग एवं कृषि क्षेत्र को अपनी आवश्यकता भर पानी उपलब्ध हो पा रहा है और न ही आम आदमी को। सर्वप्रथम कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल हो रहे जल के उपयोग को नियंत्रित करना होगा। इसके लिए फसल के चयन में बदलाव के साथ-साथ सिंचाई के आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल करना होगा। बरसाती पानी को संजोकर रखने तथा गंदे पानी को दोबारा प्रयोग में लाने योग्य बनाने की दिशा में गंभीरतापूर्वक काम करने की जरूरत है।
इसी तरह भू-जल को प्रदूषण से बचाने पर भी प्राथमिकता के आधार पर ध्यान देना बेहद आवश्यक है। आवश्यकता पड़ने पर समुद्र के जल को सिंचाई के पानी के रूप में इस्तेमाल करने की विधि भी विकसित की जानी चाहिए, लेकिन यह ध्यान रहे कि ऐसी कोई विधि पर्यावरण को क्षति न पहुंचाए, वरना उपाय उल्टे पड़ जाएंगे। भू-जल के भारी दुरुपयोग की वजह हमारा मौजूदा कानून है जिसमें लोग जिनता चाहे उतना जल निकाल रहे हैं। भू-जल संसाधन के इस्तेमाल को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं बना है, जिसे तत्काल बनाने की जरूरत है। पानी की समस्या आज भारत के कई हिस्सों में विकराल रूप धारण कर चुकी है और इस बात को लेकर कई चर्चाएं भी हो रही हैं। इस समस्या से जूझने के कई प्रस्ताव भी हैं, लेकिन जल संरक्षण से हम इस समस्या से काफी हद तक निजात पा सकते हैं।
कहावत है बूंद-बूंद से सागर भरता है, यदि इस कहावत को अक्षरश: सत्य माना जाए तो छोटे-छोटे प्रयास एक दिन काफी बड़े समाधान में परिवर्तित हो सकते हैं। आकाश से बारिश के रूप में गिरे हुए पानी को बर्बाद होने से बचाना और उसका संरक्षण करना पानी को बचाने का एक अच्छा प्रयास हो सकता है। जल संरक्षण के लिए ऐसे ही कई और प्रयास करने पड़ेंगे तभी हम जल संकट से ठीक तरह से निपटने में सक्षम हो पाएंगे। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन से पानी के वैश्विक चक्र पर भी असर पड़ेगा। इससे बारिश वाले इलाकों में ज्यादा पानी बरसेगा व सूखाग्रस्त इलाकों में और सूखा पड़ेगा।
जलाशय, नहर, ट्रीटमेंट प्लांट इस नई चुनौतियों का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। ज्यादा कीमत, जगह न मिलने, गाद की समस्या और पाबंदियों के चलते नए जलाशय का निर्माण भी मुश्किल है। रिपोर्ट में पूरी दुनिया को अमेरिका और चीन से सीख लेने की नसीहत भी दी गई है। अमेरिका का न्यूयॉर्क शहर पानी की समस्या से निपटने के लिए जलाशय की रक्षा, वन संरक्षण और वातावरण के अनुकूल खेती पर जोर दे रहा है। वहीं चीन स्पंज सिटी प्रोजेक्ट को बढ़ावा दे रहा है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा बारिश का पानी जमीन के भीतर पहुंचाने की कोशिश की जाती है। ताकि भूजल स्तर में इजाफा हो। अगर दुनिया इससे सीख कर हरित जल नीति को बढ़ावा देन तो कृषि उत्पादन भी 20 प्रतिशत बढ़ जाएगा।

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