वन्यजीव कानून को मिली नई ताकत


राजएक्सप्रेस, भोपाल। काला हिरण शिकार मामले (Black Buck Case) में फिल्म अभिनेता सलमान खान (Salman Khan) को सुनाई गई सजा से स्वाभाविक ही यह संदेश गया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। हमारे देश में काफी अरसे से यह आम धारणा रही है कि अगर आरोपी धनी और ताकतवर या पहुंच वाले हों, तो वे प्राय: बच निकलते हैं। इसीलिए सलमान खान के प्रशंसकों को ही नहीं, बहुत-से अन्य लोगों को भी लगता था कि वे शायद बरी हो जाएंगे। मगर अब न्याय तंत्र की सख्ती ने रसूखदारों को उनकी हद बता दी है।
अतीत के अपराध क्षम्य नहीं होते, फिर चाहे व्यक्ति कितनी ही बड़ी पहुंच का क्यों न हो? इस बात का अहसास अदालत ने अभिनेता सलमान खान को पांच साल की सजा देकर करा दिया है। कुछ साल पहले इंसानी अपराध में तो सलमान खान कोर्ट से बच निकले थे, लेकिन एक जीव के अपराध ने पर्दे के टाइगर को कारागार की हवा खिला दी। अभिनेता सलमान की सजा के गर्भ से दो अच्छे सामाजिक संदेश बाहर निकलकर आए हैं। पहला, वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने वालों में भय पैदा हुआ होगा, तो दूसरा न्याय व्यवस्था में जनमानस की आस्था बढ़ेगी।
अब सलमान खान की सजा का डर उन रसूखदार लोगों में भय पैदा करेगा, जो वन्यजीवों को शिकार करना अपनी शान समझते हैं। दरअसल उनको यह पता होता है कि वन्यजीवों पर भारतीय कानून इतने प्रभावी नहीं हैं, जिससे उनका कुछ बिगड़ सके। कई मामलों में विभागीय उदासीनता भी देखने को मिलती है। पर, ऐसे कृत्य करने वालों की उनकी भूल मात्र होती है। कानून पहले भी सख्त थे और आज भी। लेकिन सही से इस्तेमाल नहीं किए जाते। सलमान की सजा का पूरा श्रेय बिश्नोई समाज को दिया जाना चाहिए जिन्होंने अंत तक सलमान के खिलाफ केस लड़ा और आगे की लड़ाई भी जारी रखने का दम भरते हैं।
वन विभाग हो या स्थानीय प्रशासन सभी ने सलमान के केस को कमजोर करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सलमान खान की गोली से मारे गए दोनों काले हिरणों का जब पोस्टमार्टम किया गया, तब डॉक्टरों ने भद्दा मजाक किया। रिपोर्ट में उन्होंने बताया कि एक हिरण की मौत कुत्ते के काटने से हुई जबकि दूसरे की मौत ज्यादा खाना खाने से। मामला जब मीडिया में आया तो तूल पकड़ गया। इससे बिश्नोई समाज को लड़ने में और ताकत मिली। बीस सालों से यह मामला आग की लपटों की तरह फैला हुआ था। डॉक्टरों की पीएम रिपोर्ट भी चर्चा का केंद्र बनी रही। हालांकि, कोर्ट ने उनकी रिपोर्ट को गवाहों के बयानों के आधार पर खारिज कर दिया था।
आरोपियों ने केस को दफन करने के लिए सत्ता और धन का भी खूब इस्तेमाल किया। लेकिन काम नहीं आया। यह अलग बात है कि बड़े लोगों के लिए बचने के कई रास्ते होते हैं। सलमान भी उन सभी रास्तों का इस्तेमाल करेंगे। वन्यजीवों को संरक्षित करने के मकसद से सरकार ने कई बार कठोर कदम उठाए, पर समय के साथ-साथ वह कमजोर पड़ते गए। भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम,1972 सरकार ने इस उद्देश्य से पारित किया था कि वन्यजीवों के अवैध शिकार तथा उनके हाड़-मांस और खाल के व्यापार पर रोक लगाई जा सके। इसे 2003 में संशोधित भी किया गया है।
इसका नाम भारतीय वन्य जीव संरक्षण (संशोधित) अधिनियम 2002 रखा गया जिसके तहत इसमें दंड तथा जुर्माना और भी कठोर कर दिया गया है। इसके बाद भी बदलाव किए गए थे। वन्यजीवों के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार ने वन्य जीव (संरक्षण) संशोधन विधेयक-2013 को अगस्त 2013 को पेश किया था। तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन द्वारा वन्य जीव (संरक्षण) संशोधन विधेयक-2013 को सदन में पेश किया गया। इसके जरिए वर्ष 1972 के मूल कानून में खासा संशोधन किया गया, जिसमें नए प्रावधानों के तहत उल्लंघन करने वालों पर सात तक की सजा निर्धारित की गई।
पर, यह कानून आज भी प्रभावी नहीं है। जिस केस को मीडिया हवा देती है, उस केस में गर्मी दिखा दी जाती है। वरना तो सैकड़ों मामले आज भी सरकारी फाइलों में धूल फांक रहे हैं। केस को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में बिश्नोई समाज के लोगों ने मार्च 1998 में दायर किया था। उस दौरान उन पर केस वापस लेने का भी काफी दबाव बनाया गया, लेकिन वे अपने फैसले पर चट्टान की तरह अटल रहे। उनके द्वारा दायर केस पर अदालत ने सलमान खान पर वन्यजीव संरक्षण कानून की धारा 51 व अन्य को वन्यजीव संरक्षण कानून की धारा 51 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 149 (गैरकानूनी जमावड़ा) के तहत दोषी माना।
हालांकि सलमान खान के अलावा बाकी कलाकारों को बरी कर दिया गया, लेकिन पर्दे के टाइगर को जकड़ लिया गया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट देव कुमार खत्री ने 1998 में हुई इस घटना के संबंध में गत 28 मार्च को मुकदमे की सुनवाई पूरी कर फैसले को सुरक्षित रख लिया था। सलमान खान को कतई उम्मीद नहीं थी कि वे दोषी ठहराए जाएंगे। सलमान खान ने जैसे ही अपने खिलाफ फैसला सुना तो सिर पर हाथ रखकर बैठ गए और अवाक हो गए। उनको यह उम्मीद थी कि पिछले मामलों की तरह यहां से भी वह पाक-साफ होकर मुंबई लौटेंगे। पर, ऐसा हो न सका।
सलमान खान के बाद वन्य कानून ऐसे अपराधियों के लिए नजीर साबित होना चाहिए।

अपराधी इस भूल में रहते हैं कि फॉरेस्ट कानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन गत कुछ वर्षो से वन्यजीव कानूनों में खासा बदलाव किया गया है। हालांकि, असर अब भी दिखना बाकी है। मानवता तो यही कहती है कि मूक प्राणियों की रक्षा की जाए, लेकिन कुछ इंसान उन्हीं जीवों की जान लेने पर आमादा हैं। अगर कानून का जरा भी भय होता तो आज से करीब बीस साल पहले अपने साथी कलाकारों के साथ सलमान खान जंगली जानवरों का खून नहीं करते। सरकारी वकील ने कोर्ट में इस बात की भी दलीलें दी कि सलमान खान झगड़े करने के आदी हैं। ऐसे में उनको फर्क नहीं पड़ता कि सामने इंसान है या बेजुबान जानवर।
अगर उनमें इंसानियत होती तो वे हिरणों को नहीं मारते। सूत्र बताते हैं कि उस समय सलमान को उनके साथियों ने ऐसा करने के लिए रोका भी पर नहीं माने और गोली चला दी। सलमान की सजा को ज्यादातर लोग जायज ठहरा रहे हैं। सुप्रसिद्ध कानूनविद् राम जेठमलानी ने सजा को उचित बताया है। उनका कहना है कि मर्डर चाहे इंसान का हो या जानवर का, अपराध की श्रेणी में आता है और ऐसा करने वालों पर कानून के हिसाब से कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। वन्यजीवों की पूर्व घटनाओं के आंकड़ों पर नजर डालें तो कई मामले अब तक ऐसे हुए जिन पर कार्रवाई नहीं हुए। दो साल पहले की ही बात है जब बंगाल के जंगलों में एक साथ कुछ लोगों ने दर्जनों हाथियों को गोलियों से छलनी कर दिया।
उसमें प्रशासन ने घटना में शामिल लोगों का पता लगाना भी उचित नहीं समझा और मामला सरकारी फाइलों में ही दफन कर दिया। कुछ भी हो जोधपुर के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत से सलमान के लिए निकला यह फरमान अब वन्यजीव कानून को सशक्त बनाने में मदद करेगा। कहा जाता है कि अतीत के अपराध कभी क्षम्य नहीं होते। मौजूदा हिरण केस उसी का परिचायक मात्र है। जेल में सलमान खान की पहली रात करवट बदलकर और बड़ी बेचैनी के साथ गुजरी। दूसरी रात की कहानी भी कुछ ऐसी ही होगी। उन्हें बेसब्री से इंतजार है कि कब वे बाहर आ सकें, लेकिन उन पर कोर्ट द्वारा दिया फैसला भविष्य में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए नजीर साबित होगा।

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